Sunday, March 10, 2019

''Manushya ke bheetar isharya ki bhaavna''

         ''मनुष्य के भीतर ईष्र्या/ जलन की  भावना''

ईष्र्या एक ऐसा शब्द है जो मानव के खुद के जीवन को तहस-नहस करता है और दूसरों के जीवन में भी खलबली मचाता है। यदि आप किसी को सुख या ख़ुशी नहीं दे सकते तो कम से कम दूसरों के सुख और ख़ुशी देखकर जलिये मत। यदि आपको खुश नहीं होना है तो न सही मत होइए खुश, किन्तु किसी की खुशियों को देखकर अपने आपको ईष्र्या की आग में न जलाए। अक्सर समाज में देखा जाता है की कोई आगे बढ़ रहा है, किसी की उन्नति हो रही है, नाम हो रहा है, किसी का अच्छा हो रहा है तो अधिक्तर लोग ऐसे देखने को मिलेंगे जो पहले यह सोचेंगे, कैसे आगे बढ़ते लोगों की राह का रोड़ा बना जाए। उनको कैसे नीचा दिखाया जाए। कैसे समाज में उनका मज़ाक बने और कैसे उनकी खुशियाँ छीनी जाए। बहुत ही कम लोग ऐसे होते है जो किसी को आगे बढ़ता देख, किसी की उन्नति होते देख आनंद का अनुभव करते है। देखा जाए तो हमें हमारी ईष्र्या जलाती है क्योंकि इसका प्रभाव हमारे अन्तर्मन पर पड़ता है। हम चिड़चिड़े हो जाते है और हमारा स्वाभाव झगड़ालू हो जाता है। हम अंदर ही अंदर से खोखले होते जाते है और कहीं न कहीं स्वयं का ही नुक्सान कर बैठते हैं। मेरा मानना है कि हमें ईष्र्या करने के बजाए सामने वाले इंसान के गुणों को अपनाना चाहिए और जीवन में उनसे कुछ सीखना और लाभ लेना चाहिए ताकि हमारा जीवन भी खुशहाल हो न कि सिर्फ जलन में ही हमारी पूरी ज़िन्दगी ऐसे ही व्यर्थ चली जाए। इस तरह ईष्र्या की भावना से बचने पर स्वयं की ज़िन्दगी में भी सुकून आ जाएगा और हम भी अपनी ज़िन्दगी का पूर्ण रूप से आनंद ले सकेंगे। हमें भी अंदरूनी ख़ुशी का एहसास होगा और हमारा स्वयं का भी उद्धार हो सकेगा। हमें खुद भी हमेशा खुश रहना चाहिए और दूसरों को भी ख़ुशी से रहने देना चाहिए। इस तरह समाज में ईष्र्या के कारण पैदा हो रही बुराइयों का भी खात्मा हो जाएगा।      

 

''Bharti naari ki bhumika''

                          ''भारतीय नारी की भूमिका'' 

महिलाएँ समाज के विकास एवं तरक्की में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनके बिना विकसित समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती। समाज के विकास के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि लड़कियों को शिक्षा में किसी तरह की कमी न आने दें क्योंकि उन्हें ही आने वाले समय में लड़कों के साथ समाज को एक नई दिशा देनी है। अगर कोई आदमी शिक्षित होगा तो वह केवल अपना विकास कर पाएगा पर वहीं अगर कोई महिला सही शिक्षा हासिल करती है तो वह अपने साथ साथ पूरे समाज को बदलने की ताकत रखती है। भारत की लगभग आधी जनसँख्या का प्रतिनिधित्व महिलाएँ करती हैं। महिलाएँ परिवार बनाती है, परिवार घर बनाता है, घर समाज बनाता है और समाज ही देश बनाता है। इसका सीधा सीधा अर्थ यही है कि महिला का योगदान हर जगह है। महिला की क्षमता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। महिला यह जानती है कि उसे कब और किस तरह से मुसीबतों से निपटना हैं। ज़रुरत है तो बस उसके सपनों को आज़ादी देने की। आज चारो तरफ महिलाएँ हर क्षेत्र में फैली हुई हैं। कोई भी क्षेत्र हो, महिलाएँ पुरुषों से पीछे नहीं हैं। आज की महिला जिस जवाबदारी से व्यवसायिक दुनिया में सफल हो रही है उतनी ही कुशलता से वह घर-गृहस्थी की ज़िम्मेदारी भी निभा रही हैं। आज के पुरुष प्रधान समाज में महिला चाहे कितनी ही तरक्की कर ले, उसे पुरुष के अहंकार को झेलना ही पड़ता है। पिछले कई सालों से भारतीय नारी की भूमिका में काफी फर्क आया है। भारत के बड़े शहरों में घूमिये तो हर क्षेत्र में नारी आगे बढ़ती दिखती है, चाहे वह विश्वविद्यालय की छात्राएँ हों या डॉक्टर, वकील जैसे पेशे में जुटी नारियाँ या फिर हर तरह के काम में लगी नौकरी करने वाली नारी हो। नारी को जन्म लेने से मृत्यु तक एक लम्बे सफर को तय करना होता है। उसके लिए हर दिन, हर पल, हर समय, हर साल, हर उम्र के बढ़ते दौर में परिक्षा की कठिन घडी होती है। समझौता औरत का दूसरा नाम होता है। भारतीय नारी में सहनशीलता कूट-कूटकर भरी होती है, जिसके कारण वह ज़्यादातर बिना शिकायत के अपना जीवन अपने पति, बच्चों व घरवालों की ख़ुशी के लिए काट देती है। उसके इस देश पर हुए महान उपकारों और बलिदानो के कारण हमारे भारत में ८ मार्च को  ''महिला-दिवस'' भी मनाया जाता है।  
   

''Samaj me dahej pratha ki badhti samasya''

               ''समाज में दहेज़ प्रथा की बढ़ती समस्या'' 

दहेज़ प्रथा एक सामाजिक समस्या है। दहेज़ प्रथा गैर-कानूनी होने के बावजूद भी ये हमारे समाज में खुली तौर पर राज करती है। हमारे समाज में किसी लड़की की शादी के समय लड़की के परिवार वालों के द्वारा लड़के या उसके परिवार वालों को नगद या किसी भी प्रकार की कीमती चीज़ बिना मूल्य में देने को दहेज़ कहा जाता है। जिसका अर्थ लड़के के परिवार वालों द्वारा लड़के का मूल्य भी समझा जाता है। ऐसी सोच हमारे देश के भविष्य पर बड़ी रुकवाई बनकर बैठी है। दहेज़ की सोच हमारे देश की सभी उन्नति और आधुनिक तकनिकी की गाल पर एक तमाचा है। दहेज़ प्रथा हमारे देश में गरीब के परिवार से लेकर काफी बड़ी हस्तियों के घर का अनचाहा रीति बन गया है। दहेज़ प्रथा लालच का नया रूप है जो कि एक दुल्हन की ज़िन्दगी की वैवाहिक, सामाजिक, निजी, शारीरिक और मानसिक क्षेत्रों पर बुरा प्रभाव डालता है, जो कि कभी-कभी बड़े दर्दनाक परिणाम लाता हैं। दहेज़ प्रथा को निभाने वालों से ज़्यादा दोषी इस प्रथा को आगे बढ़ते हुए देख समाज में कोई ठोस कदम नहीं उठाने वाले हैं। यह प्रथा सदियों से चलती आ रही है जो कि बदलते वक़्त के साथ और भी गहरी होती चली जा रही है। यह प्रथा केवल अमीरो तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ये अब मध्य वर्गियों और गरीबों का भी सरदर्द बन गया है। दहेज़ प्रथा को बढ़ावा देने में समाज की ही अहम भूमिका है। वह समाज ही है जो कि दहेज़ प्रथा की जड़ को  मज़बूत कर रहा है। दहेज़ प्रथा का सबसे बड़ा कारण पुरुष प्रधान समाज हैं। दहेज़ प्रथा के कारण लड़कियों के साथ बहुत अन्याय होता है और अगर वह दहेज़ लाने के खिलाफ बोलती है तो उस पर अनेको अत्याचार भी किये जाते हैं। कहीं कहीं तो दहेज़ साथ न लाने की वजह से लड़कियों को जला भी दिया जाता है। इसी दहेज़ प्रथा के डर से कई माँ-बाप को उनकी बेटियाँ किसी बोझ से कम नहीं लगती। इसलिए हम सब को दहेज़ प्रथा के खिलाफ एक जूट होकर अपनी आवाज़ बुलंद करनी होगी। दहेज़ प्रथा को रोकने के लिए हमें कभी भी ऐसे घर में शादी करने के लिए अपनी स्वीकृति नहीं देनी होगी जहाँ पर दहेज़ की माँग हो रही हो। हमें महिला सशक्तिकरण पर ज़ोर देना होगा और इसकी चाबी एजुकेशन है। हमें सामाजिक जागरूकता फैलानी होगी और दहेज़ प्रथा के खिलाफ बने कानून को भी सख्ती से इस्तेमाल करना होगा। अब दहेज़ प्रथा को 'हाँ' से 'न' में बदलना का वक़्त आ गया हैं।            

''Shiksha ke sath sath vidya gyaan''

                     ''शिक्षा के साथ-साथ विद्या ज्ञान'' 

प्राचीन काल में भारत में गुरुकुलों में शिक्षा के साथ-साथ विद्या पर भी पूरा ध्यान दिया जाता था।  विद्यार्थी को ऐसे संस्कार दिए जाते थे कि वह अपने जीवन में अपना कार्य ईमानदारी, मेहनत और लग्न से कर सके। यह जरुरी है कि बच्चों को उनके विद्यार्थी जीवन से ही शिक्षा व विद्या दोनों देना आवश्यक है। शिक्षा उसे कहते है, जो पेट पालने और रोटी कमाने के काम आती है। इसमे किताबी ज्ञान- भूगोल, गणित, विज्ञान आदि विषय आते हैं। विद्या उसे कहते है, जो हमें कर्तव्य अकर्तव्य का ज्ञान कराती है। इसके अंतर्गत धर्म, संस्कार और कर्तव्य आदि आते है। विद्या मनुष्य को नम्रता की ओर ले जाती हैं। अगर बच्चे के घर के सदस्य केवल शिक्षा पर ही पूर्ण रूप से ध्यान देते रहे, तो बच्चा विद्या कहाँ से प्राप्त करेगा? बच्चे को धार्मिक ग्रंथ पड़ने का समय ही नहीं मिलता, तो उसमे शालीनता, नम्रता, धर्म, त्याग और बुद्धिजीविता आदि के गुण कहाँ से आयेंगे? यदि बच्चे में यह गुण नहीं है, तो उसकी शिक्षा किस काम की? धूर्त बनकर पैसे तो कमा लेते है, परन्तु उस पैसे से सुख नहीं मिलता। गलत तरीके से कमाया गया धन स्वास्थ्य, सम्मान और आत्मा को उन्नति नहीं दे सकता। गलत तरीके से कमाया गया धन हमेशा दुखदाई होया है। यदि नकल करके पास भी हो गए तो आपकी शिक्षा आपकी उन्नति के द्वार नहीं खोलती। इसलिए हमें हमारे गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा होनी चाहिए क्योंकि श्रद्धा से जो विद्या प्राप्त होती है वह फलती फूलती है। अनावश्यक ढंग से सफलता तो मिल जाती है और अंत में वह भी असफलता ही सिद्ध होती है। अतः मात-पिता को अपने बच्चों के पालन पोषण के अलावा उनकी शिक्षा के साथ साथ विद्या पर भी पूरा ध्यान देना चाहिए।
     

''Manushya ke bheetar isharya ki bhaavna''

         ''मनुष्य के भीतर ईष्र्या/ जलन की  भावना'' ईष्र्या एक ऐसा शब्द है जो मानव के खुद के जीवन को तहस-नहस करता है और द...