''भारतीय नारी की भूमिका''
महिलाएँ समाज के विकास एवं तरक्की में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनके बिना विकसित समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती। समाज के विकास के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि लड़कियों को शिक्षा में किसी तरह की कमी न आने दें क्योंकि उन्हें ही आने वाले समय में लड़कों के साथ समाज को एक नई दिशा देनी है। अगर कोई आदमी शिक्षित होगा तो वह केवल अपना विकास कर पाएगा पर वहीं अगर कोई महिला सही शिक्षा हासिल करती है तो वह अपने साथ साथ पूरे समाज को बदलने की ताकत रखती है। भारत की लगभग आधी जनसँख्या का प्रतिनिधित्व महिलाएँ करती हैं। महिलाएँ परिवार बनाती है, परिवार घर बनाता है, घर समाज बनाता है और समाज ही देश बनाता है। इसका सीधा सीधा अर्थ यही है कि महिला का योगदान हर जगह है। महिला की क्षमता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। महिला यह जानती है कि उसे कब और किस तरह से मुसीबतों से निपटना हैं। ज़रुरत है तो बस उसके सपनों को आज़ादी देने की। आज चारो तरफ महिलाएँ हर क्षेत्र में फैली हुई हैं। कोई भी क्षेत्र हो, महिलाएँ पुरुषों से पीछे नहीं हैं। आज की महिला जिस जवाबदारी से व्यवसायिक दुनिया में सफल हो रही है उतनी ही कुशलता से वह घर-गृहस्थी की ज़िम्मेदारी भी निभा रही हैं। आज के पुरुष प्रधान समाज में महिला चाहे कितनी ही तरक्की कर ले, उसे पुरुष के अहंकार को झेलना ही पड़ता है। पिछले कई सालों से भारतीय नारी की भूमिका में काफी फर्क आया है। भारत के बड़े शहरों में घूमिये तो हर क्षेत्र में नारी आगे बढ़ती दिखती है, चाहे वह विश्वविद्यालय की छात्राएँ हों या डॉक्टर, वकील जैसे पेशे में जुटी नारियाँ या फिर हर तरह के काम में लगी नौकरी करने वाली नारी हो। नारी को जन्म लेने से मृत्यु तक एक लम्बे सफर को तय करना होता है। उसके लिए हर दिन, हर पल, हर समय, हर साल, हर उम्र के बढ़ते दौर में परिक्षा की कठिन घडी होती है। समझौता औरत का दूसरा नाम होता है। भारतीय नारी में सहनशीलता कूट-कूटकर भरी होती है, जिसके कारण वह ज़्यादातर बिना शिकायत के अपना जीवन अपने पति, बच्चों व घरवालों की ख़ुशी के लिए काट देती है। उसके इस देश पर हुए महान उपकारों और बलिदानो के कारण हमारे भारत में ८ मार्च को ''महिला-दिवस'' भी मनाया जाता है।
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