''मनुष्य के भीतर ईष्र्या/ जलन की भावना''
ईष्र्या एक ऐसा शब्द है जो मानव के खुद के जीवन को तहस-नहस करता है और दूसरों के जीवन में भी खलबली मचाता है। यदि आप किसी को सुख या ख़ुशी नहीं दे सकते तो कम से कम दूसरों के सुख और ख़ुशी देखकर जलिये मत। यदि आपको खुश नहीं होना है तो न सही मत होइए खुश, किन्तु किसी की खुशियों को देखकर अपने आपको ईष्र्या की आग में न जलाए। अक्सर समाज में देखा जाता है की कोई आगे बढ़ रहा है, किसी की उन्नति हो रही है, नाम हो रहा है, किसी का अच्छा हो रहा है तो अधिक्तर लोग ऐसे देखने को मिलेंगे जो पहले यह सोचेंगे, कैसे आगे बढ़ते लोगों की राह का रोड़ा बना जाए। उनको कैसे नीचा दिखाया जाए। कैसे समाज में उनका मज़ाक बने और कैसे उनकी खुशियाँ छीनी जाए। बहुत ही कम लोग ऐसे होते है जो किसी को आगे बढ़ता देख, किसी की उन्नति होते देख आनंद का अनुभव करते है। देखा जाए तो हमें हमारी ईष्र्या जलाती है क्योंकि इसका प्रभाव हमारे अन्तर्मन पर पड़ता है। हम चिड़चिड़े हो जाते है और हमारा स्वाभाव झगड़ालू हो जाता है। हम अंदर ही अंदर से खोखले होते जाते है और कहीं न कहीं स्वयं का ही नुक्सान कर बैठते हैं। मेरा मानना है कि हमें ईष्र्या करने के बजाए सामने वाले इंसान के गुणों को अपनाना चाहिए और जीवन में उनसे कुछ सीखना और लाभ लेना चाहिए ताकि हमारा जीवन भी खुशहाल हो न कि सिर्फ जलन में ही हमारी पूरी ज़िन्दगी ऐसे ही व्यर्थ चली जाए। इस तरह ईष्र्या की भावना से बचने पर स्वयं की ज़िन्दगी में भी सुकून आ जाएगा और हम भी अपनी ज़िन्दगी का पूर्ण रूप से आनंद ले सकेंगे। हमें भी अंदरूनी ख़ुशी का एहसास होगा और हमारा स्वयं का भी उद्धार हो सकेगा। हमें खुद भी हमेशा खुश रहना चाहिए और दूसरों को भी ख़ुशी से रहने देना चाहिए। इस तरह समाज में ईष्र्या के कारण पैदा हो रही बुराइयों का भी खात्मा हो जाएगा।
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