''शिक्षा के साथ-साथ विद्या ज्ञान''
प्राचीन काल में भारत में गुरुकुलों में शिक्षा के साथ-साथ विद्या पर भी पूरा ध्यान दिया जाता था। विद्यार्थी को ऐसे संस्कार दिए जाते थे कि वह अपने जीवन में अपना कार्य ईमानदारी, मेहनत और लग्न से कर सके। यह जरुरी है कि बच्चों को उनके विद्यार्थी जीवन से ही शिक्षा व विद्या दोनों देना आवश्यक है। शिक्षा उसे कहते है, जो पेट पालने और रोटी कमाने के काम आती है। इसमे किताबी ज्ञान- भूगोल, गणित, विज्ञान आदि विषय आते हैं। विद्या उसे कहते है, जो हमें कर्तव्य अकर्तव्य का ज्ञान कराती है। इसके अंतर्गत धर्म, संस्कार और कर्तव्य आदि आते है। विद्या मनुष्य को नम्रता की ओर ले जाती हैं। अगर बच्चे के घर के सदस्य केवल शिक्षा पर ही पूर्ण रूप से ध्यान देते रहे, तो बच्चा विद्या कहाँ से प्राप्त करेगा? बच्चे को धार्मिक ग्रंथ पड़ने का समय ही नहीं मिलता, तो उसमे शालीनता, नम्रता, धर्म, त्याग और बुद्धिजीविता आदि के गुण कहाँ से आयेंगे? यदि बच्चे में यह गुण नहीं है, तो उसकी शिक्षा किस काम की? धूर्त बनकर पैसे तो कमा लेते है, परन्तु उस पैसे से सुख नहीं मिलता। गलत तरीके से कमाया गया धन स्वास्थ्य, सम्मान और आत्मा को उन्नति नहीं दे सकता। गलत तरीके से कमाया गया धन हमेशा दुखदाई होया है। यदि नकल करके पास भी हो गए तो आपकी शिक्षा आपकी उन्नति के द्वार नहीं खोलती। इसलिए हमें हमारे गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा होनी चाहिए क्योंकि श्रद्धा से जो विद्या प्राप्त होती है वह फलती फूलती है। अनावश्यक ढंग से सफलता तो मिल जाती है और अंत में वह भी असफलता ही सिद्ध होती है। अतः मात-पिता को अपने बच्चों के पालन पोषण के अलावा उनकी शिक्षा के साथ साथ विद्या पर भी पूरा ध्यान देना चाहिए।
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